परिचय
वीरांगना मालती बाई लोधी जी बुंदेलखंड की एक महान स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय साहस और निष्ठा का परिचय दिया। वे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जी की बाल-सहेली, अंगरक्षिका तथा उनकी सबसे विश्वासपात्र सहयोगिनी थीं। रानी लक्ष्मीबाई जी के साथ उन्होंने अनेक बार युद्धभूमि में भाग लिया और अंतिम समय तक उनकी रक्षा की।
रानी लक्ष्मीबाई जी की अंगरक्षिका
मालती बाई लोधी जी का झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जी के साथ अत्यंत घनिष्ठ संबंध था। बचपन से ही वे रानी जी की सहेली रहीं और समय के साथ उनकी विश्वासपात्र अंगरक्षिका बन गईं। रानी जी के युद्ध प्रशिक्षण, घुड़सवारी एवं शस्त्र-विद्या के दौरान मालती बाई जी सदैव उनके साथ रहती थीं और हर संकट की घड़ी में उनका साथ निभाती थीं।
1857 की क्रांति में योगदान
सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, जब झाँसी अंग्रेजों के निशाने पर थी, तब मालती बाई लोधी जी ने कई बार रानी लक्ष्मीबाई जी की जान बचाई। वे न केवल अंगरक्षिका थीं, बल्कि युद्धकला में दक्ष एक वीरांगना भी थीं। रानी जी पर जब भी संकट आता, मालती बाई जी ढाल बनकर उनके सामने खड़ी हो जाती थीं।
झाँसी का युद्ध – जून 1857
जून 1857 के युद्ध में जब रानी लक्ष्मीबाई जी घायल हुईं और उनका घोड़ा उनसे बिछड़ गया, तब वे समरांगण (युद्धभूमि) में अकेली रह गईं। उस समय मालती बाई लोधी जी ने अंगरक्षिका होने के नाते उन्हें सहारा दिया और उनके साथ युद्धभूमि में डटी रहीं।
इसी युद्ध में मालती बाई लोधी जी की पीठ पर एक गोली लगी, लेकिन वे तब तक लड़ती रहीं जब तक कि उनके प्राण मातृभूमि के लिए बलिदान न हो गए। वे रानी लक्ष्मीबाई जी से पहले ही वीरगति को प्राप्त हो गईं, और इतिहास में वीरता तथा निष्ठा की अमर मिसाल बन गईं।
अन्य बलिदानी योद्धा – सुखराज सिंह लोधी जी
इसी युद्ध में वीर सेनानी सुखराज सिंह लोधी जी भी झाँसी के दुर्ग पर रानी से पहले लड़ते-लड़ते शहीद हो गए थे। इन दोनों बलिदानों ने झाँसी के संघर्ष को अमर कर दिया।