1. प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
स्वामी ब्रह्मानंद लोधी का जन्म 4 दिसंबर 1894 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले की राठ तहसील के अंतर्गत बरहरा नामक छोटे से गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक गरीब किंतु संस्कारी लोधी (कुर्मी क्षत्रिय) परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम श्री मातादीन लोधी और माता का नाम श्रीमती जशोदाबाई था।
बाल्यकाल में उनका नाम “शिवदयाल” था। वे बचपन से ही गहन चिंतनशील, धर्मपरायण और आध्यात्मिक रुचियों वाले थे। उन्हें बचपन से ही रामायण, महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रंथों में अत्यधिक रुचि थी। उनका परिवार खेती-बाड़ी करता था, और कठिन आर्थिक परिस्थितियों में भी उन्होंने उच्च नैतिक मूल्यों का पालन किया।
2. शिक्षा एवं युवावस्था
स्वामी ब्रह्मानंद की प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। उन्होंने औपचारिक शिक्षा से अधिक आत्मशिक्षा पर बल दिया और स्वयं धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों का अध्ययन करते रहे।
उनके विचारों और स्वभाव को देखकर उनके पिता को भय हुआ कि कहीं उनका पुत्र संन्यासी न बन जाए। इसी कारण मात्र 7 वर्ष की आयु में उनका विवाह राधाबाई नामक कन्या से करवा दिया गया। विवाहोपरांत उन्हें एक पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई।
परंतु वैवाहिक जीवन के बावजूद उनका मन सांसारिक जीवन में न रमा और 24 वर्ष की आयु में उन्होंने हरिद्वार जाकर संन्यास ले लिया। हर की पैड़ी पर विधिपूर्वक संन्यास लेकर वे “स्वामी ब्रह्मानंद” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
3. संन्यास और आध्यात्मिक यात्रा
संन्यास ग्रहण करने के पश्चात स्वामी ब्रह्मानंद ने भारत के प्रमुख तीर्थ स्थानों और धार्मिक स्थलों की पदयात्रा की। उन्होंने साधना, ध्यान और स्वाध्याय के माध्यम से गीता और वेदांत के रहस्यों को आत्मसात किया।
पंजाब के बठिंडा में उनकी भेंट महात्मा गांधी से हुई, जिन्होंने उनके त्याग और विचारों की अत्यंत सराहना की। गांधी जी ने कहा: “यदि मेरे पास स्वामी ब्रह्मानंद जैसे 100 संन्यासी हो जाएं, तो भारत को तुरंत स्वतंत्रता मिल सकती है।”
4. स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी
स्वामी ब्रह्मानंद का राष्ट्रप्रेम केवल विचारों तक सीमित नहीं था। उन्होंने सक्रिय रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। 1930 के नमक सत्याग्रह में भाग लेते हुए वे गिरफ्तार हुए और दो वर्षों तक जेल में रहे।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया और पुनः जेल गए। उन्होंने हमीरपुर, हरदोई और कानपुर की जेलों में कारावास भुगता। बरेली जेल में उनकी भेंट पंडित जवाहरलाल नेहरू से हुई।
उनका प्रसिद्ध नारा था: “उठो! वीरो उठो!! दासता की जंजीरों को तोड़ फेंको!”
5. शिक्षा सुधार और समाजसेवा
स्वामी ब्रह्मानंद का मानना था कि समाज में बदलाव शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। बुंदेलखंड क्षेत्र की अशिक्षा और पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उन्होंने कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना की:
- 1938 में राठ में ब्रह्मानंद विद्यालय की स्थापना की।
- 1943 में ब्रह्मानंद संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की।
- 1960 में ब्रह्मानंद महाविद्यालय, राठ की स्थापना की, जो आज भी क्षेत्र में शिक्षा का प्रमुख केंद्र है।
इन संस्थानों के माध्यम से उन्होंने हज़ारों छात्रों को शिक्षा का अवसर दिया, विशेष रूप से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को।
6. गौ-रक्षा आंदोलन और सत्याग्रह
1966 में स्वामी ब्रह्मानंद ने गोवध के विरोध में प्रयागराज से दिल्ली तक विशाल पदयात्रा निकाली। लाखों लोगों ने इस आंदोलन में भाग लिया।
दिल्ली में संसद भवन के समक्ष सत्याग्रह किया गया, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा गया। जेल में उन्होंने प्रण लिया कि संसद में जाकर वे गौ-रक्षा के लिए आवाज उठाएंगे।
7. संसद में प्रवेश: भारत के पहले संन्यासी सांसद
1967 में स्वामी ब्रह्मानंद ने जनसंघ के टिकट पर हमीरपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीत दर्ज की। वे भारत के पहले संन्यासी सांसद बने।
संसद में उन्होंने गौ-हत्या रोकने के लिए जोरदार एक घंटे का भाषण दिया, जिसे आज भी ऐतिहासिक माना जाता है। 1971 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पुनः चुनाव लड़ा और दूसरी बार सांसद बने। वे 1967 से 1977 तक संसद सदस्य रहे।
8. आदर्श जीवन और सादगी
स्वामी ब्रह्मानंद आजीवन “पैसा न छूने” के संकल्प पर कायम रहे। उन्होंने सांसद की पेंशन और यात्रा भत्ते आदि को गरीब छात्रों की सहायता और समाजसेवा के लिए दान कर दिया।
उनकी वाणी, आचरण और जीवनशैली पूर्णतः त्याग, संयम और सेवा की मिसाल थी। वे सादा वस्त्र पहनते, खड़ाऊं पहनते और साधु जीवन जीते रहे। उनका संपूर्ण जीवन जनता को समर्पित था।
9. निधन और स्मृति
स्वामी ब्रह्मानंद ने 13 सितंबर 1984 को अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार बुंदेलखंड की भूमि पर उनकी इच्छा अनुसार संपन्न हुआ।
उनकी स्मृति में कई शिक्षण संस्थान, समाजसेवी संगठन और स्मारक आज भी कार्यरत हैं। 4 दिसंबर 2019 को उनकी 125वीं जयंती देशभर में श्रद्धा से मनाई गई।
10. निष्कर्ष
स्वामी ब्रह्मानंद लोधी का जीवन एक आदर्श संयोजन था – आध्यात्मिकता, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक सुधार और शिक्षा सेवा का। वे न केवल लोधी समाज बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
उनकी प्रसिद्ध उक्ति थी: “सेवा ही मेरा धर्म है, और जनकल्याण ही मेरा संकल्प।”
हमारा कर्तव्य है कि हम उनके आदर्शों को अपनाएं और अपने समाज को सशक्त, शिक्षित और स्वावलंबी बनाएं।
नमन इस कर्मयोगी को:
“लाखों जीते लाखों मरते, याद कहाँ किसी की रह जाती,रहता नाम अमर उन्हीं का, जो दे जाते अनुपम थाती।”